‘नशा बन रहा समाज के लिए खतरा’, मीरवाइज उमर फारूक ने शराबबंदी की उठाई मांग

हुर्रियत के पूर्व चेयरमैन और मीरवाइज-ए-कश्मीर मौलवी उमर फारूक ने कहा है कि नशीले पदार्थों के खिलाफ लड़ाई की आड़ में लोगों पर की जा रही कार्रवाई और आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल एक गंभीर मामला है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने सरकार से अपील की है कि वह लोगों को नाराज करने के बजाय उनका भरोसा और सद्भावना जीतने के लिए अपने नजरिए पर फिर से विचार करें.

श्रीनगर की जामा मस्जिद में शुक्रवार (08 मई) की नमाज के दौरान लोगों को संबोधित करते हुए, मीरवाइज उमर फारूक ने नशीले पदार्थों की परेशानी से निपटने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि यह लड़ाई तब तक सफल नहीं हो सकती, जब तक नशे के एक रूप को निशाना बनाया जाए और दूसरे को बढ़ावा दिया जाए. साथ ही, उन्होंने शराब की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगाने की भी जोरदार अपील की.

‘जामिया सिराज उल उलूम’ पर प्रतिबंध को लेकर क्या बोले मीरवाइज?

UAPA कानून के तहत ‘जामिया सिराज उल उलूम’ पर प्रतिबंध लगाने के मामले को एक गंभीर मुद्दा बताते हुए, मीरवाइज ने कहा कि इस कार्रवाई से लोगों में यह आशंका पैदा हो गई है कि हमारी धार्मिक पहचान और ट्रस्टों व स्थानीय समितियों द्वारा चलाए जा रहे शिक्षण संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है. इसके अलावा, इस कार्रवाई से वहां पढ़ने वाले सैकड़ों छात्रों का भविष्य भी बर्बाद हो रहा है.

नशे का मसला तकलीफदेह बन गया- मीरवाइज

कल इस मुद्दे पर हुए विरोध-प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए, मीरवाइज ने कहा कि मौजूदा हालात में छात्रों और उनके माता-पिता का विरोध करने के लिए आगे आना, इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा उनके लिए कितना जरूरी और तकलीफदेह बन गया. उन्होंने कहा, ”सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना चाहिए कि अगर उन्हें ऐसे कदमों के खिलाफ लोगों का खुला विरोध दिखाई नहीं दे रहा है, तो इसकी वजह यह है कि लोगों या नेतृत्व के पास ऐसी नीतियों के प्रति अपनी असहमति और नाराजगी जाहिर करने के लिए कोई जगह ही नहीं बची है.

‘नीतियों के खिलाफ लोगों की नाराजगी ले सकती है बड़ा रूप’

मीरवाइज उमर फारूक ने कहा, ”अगर सरकार अपने इस नजरिए पर फिर से विचार नहीं करती और इस संस्थान (जामिया सिराज उल उलूम) और ऐसे ही अन्य संस्थानों को फिर से खोलने की अनुमति नहीं देती-ताकि वे भी अन्य जगहों के शिक्षण संस्थानों की तरह ही काम कर सकें तो इन नीतियों के ख़िलाफ लोगों के मन में सुलग रही नाराजगी कभी भी एक बड़े विरोध का रूप ले सकती है.”

उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों से आग्रह किया कि वे अपने इस नज़रिए पर फिर से विचार करें और लोगों को ऐसी तकलीफदेह कार्रवाइ से नाराज करने के बजाय, उनका भरोसा और सद्भावना जीतने की कोशिश करें.

‘नशीले पदार्थों के नेटवर्क के खिलाफ अभियान स्वागत योग्य पहल’

नशीले पदार्थों के बढ़ते खतरे का जिक्र करते हुए मीरवाइज ने कहा, ”जम्मू-कश्मीर में नशीले पदार्थों के तस्करों और उनके नेटवर्क के खिलाफ सरकार द्वारा चलाया जा रहा अभियान एक स्वागत योग्य पहल है. उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को नशे के इस भयानक जाल से बचाने के लिए किया गया हर सच्चा प्रयास स्वागत के योग्य है, क्योंकि आज नशा हमारे समाज के सामने खड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है.

‘नशे की लत में फंसने का खतरा बहुत ज्यादा’

इसके साथ ही, मीरवाइज ने यह भी कहा कि हम इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि राजनीतिक संघर्ष, अनिश्चितता, मानसिक तनाव और रोजगार के सीमित अवसरों के बीच पली-बढ़ी एक पूरी पीढ़ी के लिए, नशीले पदार्थों के सेवन की लत में फँसने का खतरा बहुत ज़्यादा होता है. उन्होंने कहा कि इस संकट को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से, या गिरफ्तारियों और संपत्ति जब्त करने जैसी सुर्खियां बटोरने वाली घटनाओं के चश्मे से नहीं देखा जा सकता.

नशीले पदार्थों के तस्करों के नेटवर्क का खात्मा जरूरी- मीरवाइज

मीरवाइज़ ने कहा कि आज कई युवा राजनीतिक अनिश्चितता और अपने भविष्य को लेकर चिंता के चलते एंग्ज़ायटी (चिंता), निराशा और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं. इसलिए, जहां एक ओर नशीले पदार्थों के तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और उनके नेटवर्क को खत्म करना ज़रूरी है, वहीं केवल पुलिसिंग से इस स्वास्थ्य आपातकाल का समाधान नहीं हो सकता, और न ही इससे एक घायल समाज का घाव भर सकता है.

मीरवाइज़ ने कहा कि इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए, 2014 के आसपास MMU (मुत्तहिदा मजलिस उलेमा) के तत्वावधान में नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के खिलाफ और सामाजिक सुधार के लिए एक अभियान भी शुरू किया गया था, जिसमें इस प्रयास में मस्जिदों और इमामों की भूमिका पर जोर दिया गया था. उन्होंने कहा कि सभी पक्षों की ओर से किए गए सामूहिक प्रयास इस समस्या से निपटने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं.

इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि समाज को ईमानदारी से यह भी स्वीकार करना होगा कि नशे की लत केवल मादक पदार्थों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शराब भी एक नशा है और एक खतरनाक सामाजिक बुराई है. उन्होंने कहा, ”इस्लाम ने हमेशा से ही नशीले पदार्थों का कड़ा विरोध किया है, क्योंकि वे व्यक्ति और समाज—दोनों को ही नुकसान पहुंचाते हैं.”

मीरवाइज ने आगे कहा कि कश्मीर ऐतिहासिक रूप से एक ऐसा समाज रहा है जिसकी जड़ें आध्यात्मिकता, नैतिकता और सामाजिक मूल्यों में गहरी जमी हुई हैं. इसलिए, जहां एक ओर नशीले पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई ज़रूरी और स्वागत योग्य है, वहीं समाज में शराब का बढ़ता सामान्यीकरण और उसकी आसान उपलब्धता भी उतनी ही चिंता का विषय है.

उन्होंने कहा कि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अब पूरे जम्मू-कश्मीर में सैकड़ों लाइसेंसी शराब की दुकानें (Liquor Vends) खुल चुकी हैं, और हाल के वर्षों में शराब की बिक्री से होने वाले राजस्व में काफी बढ़ोतरी हुई है. इससे एक अहम सवाल खड़ा होता है. क्या नशे की एक लत से तब तक लड़ा जा सकता है, जब दूसरी लत को साथ-साथ बढ़ावा दिया जा रहा हो?

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