बड़ी खबर: क्या इस मानसून आपके इलाके में होगी कम बारिश? मौसम विभाग की 20 सालों में सबसे बड़ी भविष्यवाणी

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने 2026 के जून से सितंबर में मानसून के लिए अपनी पहली भविष्यवाणी जारी की है, जिसमें पूरे देश में औसत से कम बारिश होने की संभावना जताई गई है. IMD ने कहा है कि इस बार देश को कुल 92 प्रतिशत ही सामान्य बारिश मिलेगी. यह पिछले 20 सालों में IMD की सबसे कम बारिश वाली पहली भविष्यवाणी है, लेकिन घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत पिछले कुछ सालों में मानसून की ऊपर-नीचे होने वाली स्थिति के तैयार चुका है. सात साल लगातार अच्छी बारिश के बाद यह पहला मौका है जब IMD ने औसत से कम बारिश की बात कही है, लेकिन पानी प्रबंधन, भूजल संरक्षण और IMD की बेहतर भविष्यवाणी ने हालात को संभालने लायक बना दिया है. कैसे? एक्सप्लेनर में समझते हैं…

सवाल 1: मानसून में 92 प्रतिशत बारिश का मतलब क्या होता है?  
जवाब: जून से सितंबर के बीच मानसून भारत की कुल सालाना बारिश का 70 प्रतिशत से ज्यादा लाता है. यह सिर्फ गर्मी से राहत नहीं देता, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी सीधे प्रभावित करता है. देश की लगभग आधी खेती अभी भी बारिश पर निर्भर है. सही समय पर अच्छी बारिश अच्छी फसल, किसानों की आय और ग्रामीण मांग को बढ़ाती है. इसके अलावा मानसून जलाशयों को भरता है, जो पूरे साल पीने का पानी, बिजली और इंडस्ट्रीज की जरूरत पूरी करते हैं. नदियों का बहाव, अंतर्देशीय जल परिवहन और भूजल रिचार्ज भी मानसून पर निर्भर करते हैं.

IMD की 92 प्रतिशत वाली भविष्यवाणी का मतलब है कि कुल बारिश सामान्य (100 प्रतिशत) से 8 प्रतिशत कम रहेगी. IMD ने यह भविष्यवाणी ±5 प्रतिशत की गलती की सीमा के साथ दी है. यह पूरे देश के लिए औसत है और हर जगह समान बारिश नहीं होगी.

सवाल 2: बारिश कब और कहां कम रहने वाली है?  
जवाब: IMD के मुताबिक, पूरे देश में लगभग हर जगह औसत से कम बारिश की उम्मीद है. सिर्फ पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीप के कुछ इलाकों में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश हो सकती है. समय के हिसाब से जून और जुलाई में बारिश सामान्य रहने की संभावना है, लेकिन अगस्त और सितंबर सूखे रहेंगे. मुख्य वजह पूर्वी प्रशांत महासागर में एलनीनो की स्थिति है, जो जुलाई में अपने चरम पर पहुंचेगी. इसका असर भारत पर एक-दो महीने की देरी से पड़ता है, इसलिए दूसरा हिस्सा सूखा रहेगा.

सवाल 3: बारिश कम होने की असली वजह क्या है?
जवाब: एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस बार औसत से कम बारिश का मुख्य कारण पूर्वी प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा एलनीनो है. एलनीनो आमतौर पर भारत के मानसून को कमजोर करता है. IMD के मुताबिक यह स्थिति जुलाई में चरम पर होगी और उसका प्रभाव अगस्त-सितंबर में सबसे ज्यादा दिखेगा. पिछले सात साल अच्छी बारिश वाले रहे थे, लेकिन अब एलनीनो की वजह से यह बदलाव आ रहा है. साथ ही, जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम के पैटर्न डगमगा गए हैं. भारी बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं और सूखे के लंबे दौर बढ़े हैं, लेकिन IMD की भविष्यवाणी अब ज्यादा सटीक, समय पर और ऑथेंटिक हो गई है, जो पहले से बेहतर तैयारी करने में मदद करती है.

सवाल 4: फिर भी घबराने की जरूरत क्यों नहीं?
जवाब: अब भारत मानसून की ऊपर-नीचे होने वाली स्थिति के प्रति काफी लचीला बन चुका है. पहले कम बारिश की भविष्यवाणी से सरकार, बाजार और किसान घबरा जाते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. कई वजहें हैं:

  • ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के तहत हजारों तालाब, कुएं, चेक डैम बनाए गए, जिससे ग्राउंड वॉटर लेवल बढ़ा और बारिश पर निर्भरता कम हुई. यानी बेहतर पानी प्रबंधन हुआ.
  • केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि ज्यादातर इलाकों में भूजल स्थिति सुधरी है.
  • नदियों और झीलों की सफाई अभियान से कई जल स्रोत फिर से इस्तेमाल लायक हो गए.
  • IMD की भविष्यवाणी अब ज्यादा सटीक और कार्रवाई योग्य है, जिससे नीति-निर्माण आसान हुआ है.
  • 2024 और 2025 में दोनों साल 100 प्रतिशत से ज्यादा बारिश हुई, इसलिए देश के 166 बड़े जलाशयों में पानी का स्टोरेज पिछले साल से बेहतर और पिछले 10 साल के औसत से भी ज्यादा है. यह स्टोरेज इस साल की कमी को काफी हद तक संभाल लेगा.

भारत अब बारिश की कमी से ज्यादा भारी बारिश और बाढ़ से निपटने में चुनौती का सामना करता है.

सवाल 5: कम बारिश से कृषि, जलाशयों और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?
जवाब: एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर बारिश की कमी बहुत ज्यादा न हुई तो बड़ा खतरा नहीं है. कृषि पर असर तभी ज्यादा पड़ेगा जब सूखा वाकई गंभीर हो, लेकिन जलाशयों का अच्छा स्टोरेज, भूजल सुधार और पानी संरक्षण के काम इसे बफर कर देंगे. पीने का पानी, बिजली और उद्योगों की जरूरतें भी जलाशयों से पूरी हो सकेंगी. नीति-निर्माताओं को अब पहले से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. पानी का प्रबंधन, फसल बीमा और वैकल्पिक सिंचाई पर फोकस करना होगा. हाईन्यूज़ !

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