यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने आज सऊदी अरब के कई रणनीतिक और आर्थिक ठिकानों पर बड़े पैमाने पर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए. इन हमलों के निशाने पर अभा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, किंग खालिद एयर बेस और अभा व जिज़ान स्थित सऊदी अरामको की तेल सुविधाएं थीं. हूती मीडिया आउटलेट ‘अंसारुल्लाह’ ने टेलीग्राम पर एक बयान जारी कर इन हमलों की पुष्टि की और कहा कि यमनी ड्रोन और मिसाइलों ने “सऊदी दुश्मन पर ज़ोरदार और घातक प्रहार किए हैं.”
सऊदी नीत गठबंधन ने पुष्टि की कि इन हमलों से अभा, खमीस मुशैत, नज्रान और जाज़ान के इलाके प्रभावित हुए हैं. गठबंधन ने नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाए जाने पर कड़ी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है.
हालिया हमलों के 5 मुख्य कारण
यह हमला अचानक नहीं हुआ, बल्कि सीमा-पार बढ़ते सैन्य तनाव और रणनीतिक प्राथमिकताओं का नतीजा है. इन हमलों के पीछे पांच प्रमुख कारण हैं:
1. जेल पर हुए हवाई हमले का सीधा बदला
8 सितंबर के हमलों की तात्कालिक वजह 7 सितंबर को यमन के अल-जौफ़ प्रांत स्थित अल-हज़म की एक जेल पर हुआ घातक हवाई हमला बनी. हूती संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय और एसोसिएटेड प्रेस (AP) के अनुसार, इस हमले में एक बच्चे सहित कम से कम सात लोगों की मौत हुई और कई अन्य घायल हो गए. हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने इस हमले के लिए सऊदी नीत गठबंधन को जिम्मेदार ठहराते हुए “सज़ा और मुंहतोड़ जवाब” देने की कसम खाई थी, जिसे उन्होंने अगले ही दिन मिसाइल हमलों के रूप में अंजाम दिया.
2. बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य का रणनीतिक युद्ध
यमन के दक्षिण-पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में सैन्य संघर्ष बेहद तेज़ हो गया है. हूती विद्रोही वैश्विक व्यापार के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण ‘बाब अल-मंदेब’ जलडमरूमध्य के आसपास के इलाकों पर कब्ज़ा करना चाहते हैं. सऊदी समर्थित यमनी सरकारी सेनाओं (IRG) ने हूतियों की बढ़त को रोकने के लिए भारी जवाबी कार्रवाई की और सऊदी गठबंधन से हवाई सहायता माँगी, जिससे दोनों पक्षों के बीच हिंसा भड़क उठी.
3. “घेराबंदी के बदले घेराबंदी” की नीति
हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ “घेराबंदी के बदले घेराबंदी” की नीति अपनाई है. हूतियों का तर्क है कि सऊदी अरब द्वारा यमन के हवाई क्षेत्रों और समुद्री बंदरगाहों पर लगाई गई नाकाबंदी के कारण यमन में मानवीय संकट पैदा हुआ है. इसलिए, वे सऊदी अरब की आर्थिक, व्यापारिक और ऊर्जा परिसंपत्तियों पर हमले करके इस नाकाबंदी का जवाब दे रहे हैं.
4. सऊदी अर्थव्यवस्था पर वित्तीय दबाव बनाना
सऊदी अरामको की तेल रिफाइनरियों, ईंधन डिपो और अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों को निशाना बनाकर हूती विद्रोही सऊदी अरब को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाना चाहते हैं. उनका लक्ष्य यह साबित करना है कि इस युद्ध में बने रहने की रियाध को भारी वित्तीय और ढांचागत कीमत चुकानी पड़ेगी.
5. शांति वार्ता और युद्धविराम में बढ़त बनाना
2022 में संयुक्त राष्ट्र (UN) की मध्यस्थता से लागू हुआ युद्धविराम अब लगभग अप्रभावी हो चुका है. ऐसे में हूती अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करके शांति वार्ताओं में ऊपरी हाथ हासिल करना चाहते हैं. वे सीमा-पार हमलों के ज़रिए सऊदी अरब को सना हवाई अड्डे से पाबंदियां हटाने, यमनी बंदरगाहों को पूरी तरह खोलने और अपनी शर्तों पर शांति समझौते के लिए मजबूर कर रहे हैं.
सऊदी अरब और हूतियों के बीच कट्टर दुश्मनी क्यों है
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच यह संघर्ष केवल एक सीमावर्ती विवाद नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक कारण छिपे हैं
1. धार्मिक और वैचारिक मतभेद
हूती विद्रोही मुख्य रूप से इस्लाम के ज़ैदी शिया संप्रदाय से आते हैं, जो उत्तरी यमन का एक पारंपरिक समुदाय है. दूसरी ओर, सऊदी अरब एक सुन्नी बहुल राष्ट्र है, जहां सलाफी/वहाबी विचारधारा का प्रभुत्व है. 1980 और 1990 के दशक में सऊदी अरब ने उत्तरी यमन में सुन्नी धार्मिक मदरसों को बड़े पैमाने पर फंडिंग दी. हूतियों ने इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान मिटाने की कोशिश माना, जिसके विरोध में ‘हूती आंदोलन’ का जन्म हुआ.
2. सीमा विवाद और यमनी राजनीति में सऊदी दखल
सऊदी अरब यमन के साथ लगभग 1,100 मील (1,800 किमी) लंबी सीमा साझा करता है और ऐतिहासिक रूप से यमन को अपना ‘प्रभाव क्षेत्र’ मानता आया है. हूतियों का मानना है कि सऊदी अरब ने यमन को कमजोर और आर्थिक रूप से निर्भर बनाए रखने के लिए हमेशा वहां के भ्रष्ट शासकों का समर्थन किया और देश की संप्रभुता में हस्तक्षेप किया.
3. 2014-2015 का यमनी गृहयुद्ध
2011 की ‘अरब स्प्रिंग’ क्रांति के बाद यमन के सऊदी-समर्थक राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को हटना पड़ा और उनके स्थान पर अब्द रब्बू मंसूर हादी सत्ता में आए. 2014 में हूती विद्रोहियों ने तख्तापलट करते हुए राजधानी सना पर कब्ज़ा कर लिया और राष्ट्रपति हादी को देश छोड़कर सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी. इसके जवाब में मार्च 2015 में सऊदी अरब ने हूतियों को सत्ता से बेदखल करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन बनाया, जिसने एक क्षेत्रीय राजनीतिक गतिरोध को खूनी अंतर्राष्ट्रीय युद्ध में बदल दिया.
4. ईरान-सऊदी का ‘प्रॉक्सी वॉर’
मध्य पूर्व में क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए सऊदी अरब और ईरान के बीच पुरानी प्रतिद्वंद्विता है. ईरान हूती विद्रोहियों को वित्तीय मदद, सैन्य प्रशिक्षण, आधुनिक ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक प्रदान करता है. सऊदी अरब हूती-नियंत्रित यमन को केवल एक स्थानीय विद्रोही गुट नहीं, बल्कि अपनी दक्षिणी सीमा पर स्थित ईरान का एक खतरनाक ‘सैन्य अड्डा’ मानता है.
5. राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को खतरा
हूतियों द्वारा सऊदी अरब के तेल संयंत्रों, सैन्य अड्डों और नागरिक हवाई अड्डों पर किए जाने वाले लगातार हमले रियाध की राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक तेल बाज़ारों की स्थिरता के लिए सीधा खतरा हैं. सऊदी अरब किसी भी कीमत पर अपनी सीमा पर एक ऐसे सशस्त्र गुट को बर्दाश्त नहीं कर सकता जिसके पास लंबी दूरी की मिसाइल क्षमताएं हों.
हूती विद्रोही सऊदी अरब को एक ‘विदेशी आक्रामक और धार्मिक खतरे’ के रूप में देखते हैं जो यमन की आज़ादी को दबाना चाहता है. वहीं, सऊदी अरब हूतियों को एक ‘गैर-कानूनी और ईरान-संचालित चरमपंथी संगठन’ मानता है जिसने उसकी सुरक्षा को खतरे में डाल रखा है. यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच शांति के तमाम प्रयासों के बावजूद हिंसा का यह चक्र थमने का नाम नहीं ले रहा है. हाईन्यूज़ !














