याचिकाकर्ता ने की CAA कानून बनाने के लिए पीएम और गृह मंत्री पर हत्या के केस की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- आपको आखिर वकील किसने बना दिया?

नागरिकता संशोधन कानून, 2019 पारित करने के लिए प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और तत्कालीन कानून मंत्री के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करने की मांग करने वाले वकील को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है. याचिकाकर्ता को कानून की बुनियादी समझ न होने की तरफ इशारा करते हुए कोर्ट ने पूछा कि उन्हें वकील किसने बना दिया? हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने उनके ऊपर हर्जाना लगाने के हाई कोर्ट के आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया है.

पूरन चंदर सेन नाम के वकील ने अलवर के गोविंदगढ़ थाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के खिलाफ शिकायत दी थी. CAA के विरोध में देश के कई हिस्सों में हुई हिंसा और उसमें लोगों की मौत के लिए इन नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए सेन ने उनके ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की थी. थाने की तरफ से कोई कार्रवाई न होने पर वह हाई कोर्ट गए.

राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर बेंच ने 23 सितंबर 2025 को दिए आदेश में कहा कि कानून बनाना संसद का काम है. अगर किसी कानून के विरोध में कहीं हिंसा हुई हो तो उसके लिए पीएम या मंत्रियों पर मुकदमा नहीं दर्ज हो सकता. हाई कोर्ट ने याचिका को तथ्यहीन और निराधार बताते हुए वकील पर 50 हजार रुपए का हर्जाना लगाया था.

इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे वकील को यहां भी यही नसीहत मिली. चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने यह तक कह दिया कि याचिकाकर्ता को कानून का ज्ञान नहीं है. शायद किसी ने गलती से उन्हें बतौर वकील रजिस्टर्ड कर लिया होगा. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर वह और ज्यादा जिरह करेगा, तो 50 हजार के हर्जाने को बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दिया जाएगा.

हालांकि, याचिकाकर्ता के बार-बार अनुरोध पर जजों का रुख नर्म हो गया. उन्होंने कहा कि अगर याचिकाकर्ता हर्जाने के आदेश से परेशान है, तो वह उस पर विचार कर सकते हैं. पहले याचिकाकर्ता यह वचन दे कि वह भविष्य में ऐसी आधारहीन याचिका दाखिल नहीं करेगा.

याचिकाकर्ता की तरफ से भविष्य में आधारहीन याचिका दाखिल न करने का भरोसा दिलाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की तरफ से लगाए गए हर्जाने को स्थगित कर दिया. चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने आदेश में दर्ज करवाया कि अगर भविष्य में याचिकाकर्ता अपने वचन का पालन नहीं करेगा, तो हाई कोर्ट का आदेश लागू माना जाएगा.

ध्यान रहे कि दिसंबर 2019 में संसद ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पारित किया था. इस कानून का मकसद धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के चलते पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भाग कर भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को भारतीय नागरिकता देना था. इस कानून को मुसलमानों के खिलाफ बताते हुए देश के कुछ हिस्सों में हिंसक विरोध हुआ था. हाईन्यूज़ !

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