AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों की प्रस्तावित समीक्षा को लेकर चिंता जताई है. उनके बयान के बाद इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है. ओवैसी का कहना है कि एक दस्तावेज-आधारित प्रक्रिया, जिसके चलते लगभग 6.5 करोड़ नाम चुनावी सूचियों से हटाए गए थे, अब अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें देश से बाहर निकालने से जुड़ी दीर्घकालिक व्यवस्था पर चर्चा का आधार बन रही है.
कमजोर वर्गों पर असर को लेकर चिंता
ओवैसी के अनुसार, चिंता केवल हटाए गए नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि ऐसे कदमों का समाज के कमजोर वर्गों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सुरक्षा उपायों में से एक है. उनका मानना है कि बड़े पैमाने पर लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने से राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी कमजोर हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने में लोगों को आ रही परेशानियों की रिपोर्टों ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है.
मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब विदेशी नागरिक होना नहीं
ओवैसी ने कहा कि SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का यह मतलब नहीं है कि संबंधित व्यक्ति स्वतः विदेशी नागरिक घोषित हो जाता है. उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में मामले अभी भी कानूनी जांच के दायरे में हैं और कई प्रभावित लोगों के पास निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से दोबारा मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने का विकल्प मौजूद है.
विदेशी नागरिकता से जुड़े आंकड़ों पर सवाल
AIMIM प्रमुख ने यह भी सवाल उठाया कि ऐसा कोई विस्तृत आधिकारिक डेटा क्यों उपलब्ध नहीं है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कितने नाम विशेष रूप से विदेशी नागरिकता से जुड़े कारणों के आधार पर हटाए गए थे. उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़े यह संकेत देते हैं कि अल्पसंख्यक, महिलाएं, प्रवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग इस प्रक्रिया से असमान रूप से प्रभावित हुए हैं.
नई समिति की जरूरत पर उठाए सवाल
आधिकारिक जनसांख्यिकीय संकेतकों का हवाला देते हुए ओवैसी ने कहा कि देश में जनसंख्या वृद्धि स्थिर हो चुकी है और कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) 2.0 पर है. ऐसे में उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्रित एक और समिति की आवश्यकता पर सवाल उठाया. उनका तर्क है कि यह कदम वास्तविक प्रशासनिक समस्याओं के समाधान के बजाय समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अनावश्यक संदेह और बेचैनी पैदा कर सकता है.
दस्तावेजीकरण और सत्यापन प्रक्रियाओं की बढ़ती मांग की आलोचना
ओवैसी ने नागरिकों से बार-बार दस्तावेज मांगने और सत्यापन प्रक्रियाओं पर बढ़ती निर्भरता की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि KYC आवश्यकताओं से लेकर मतदाता सत्यापन अभियानों और सरकारी पोर्टलों पर बार-बार दस्तावेज जमा करने तक, लोगों से लगातार अपनी पहचान और पात्रता साबित करने को कहा जाता है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक संस्थानों को भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए और उन्हें भी उसी स्तर की जांच-पड़ताल से गुजरना चाहिए, जिसकी अपेक्षा आम नागरिकों से की जाती है. हाईन्यूज़ !















